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हनुमान चालीसा: श्री गुरु चरण सरोज रज, निज मन मुकुर सुधार (एक शेयरले बदलिन्छ जीवन)


१० माघ २०७६, शुक्रबार


दोहा-

श्री गुरु चरण सरोज रज, निज मन मुकुर सुधार ।
बरनौ रघुवर बिमल जसु, जो दायक फल चारि ।।

बुद्धिहीन तनु जानि के, सुमिरौ पवन कुमार ।
बल बुद्धि विद्या देहु मोहि हरहुं कलेश विकार ।।

।।चौपाई।।

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर, जय कपीस तिंहु लोक उजागर ।
रामदूत अतुलित बल धामा अंजनि पुत्र पवन सुत नामा ।।

महाबीर बिक्रम बजरंगी कुमति निवार सुमति के संगी ।
कंचन बरन बिराज सुबेसा, कानन कुंडल कुंचित केसा ।।

हाथ ब्रज और ध्वजा विराजे कांधे मूंज जनेऊ साजे ।
शंकर सुवन केसरी नन्दन तेज प्रताप महा जग बन्दन।।

विद्यावान गुनी अति चातुर राम काज करिबे को आतुर ।
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया रामलखन सीता मन बसिया ।

सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा बिकट रूप धरि लंक जरावा ।।
भीम रूप धरि असुर संहारे रामचन्द्र के काज संवारे ।।

लाये सजीवन लखन जियाये श्री रघुबीर हरषि उर लाये ।
रघुपति कीन्हि बहुत बड़ाई तुम मम प्रिय भरत सम भाई ।।

सहस बदन तुम्हरो जस गावे अस कहि श्रीपति कंठ लगावें ।
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा नारद सारद सहित अहीसा ।।

जम कुबेर दिगपाल कहां ते, कबि कोबिद कहि सके कहां ते ।
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा, राम मिलाय राज पद दीन्हा ।।

तुम्हरो मंत्र विभीषन माना लंकेश्वर भये सब जग जाना ।
जुग सहस्र जोजन पर भानु लील्यो ताहि मधुर फल जानु ।।

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख मांहि जलधि लांघ गये अचरज नाहिं ।
दुर्गम काज जगत के जेते सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते ।।

राम दुवारे तुम रखवारे होत न आज्ञा बिनु पैसारे ।
सब सुख लहे तुम्हारी सरना तुम रक्षक काहू को डरना ।।

आपन तेज सम्हारो आपे तीन्हू लोक हांक ते कांपे ।
भूत पिशाच निकट नहीं आवे, महाबीर जब नाम सुनावे ।।

नासै रोग हरे सब पीरा जपत निरंतर हनुमत बीरा ।
संकट ते हनुमान छुड़ावें मन क्रम बचन ध्यान जो लावें ।।

सब पर राम तपस्वी राजा, तिनके काज सकल तुम साजा ।
और मनोरथ जो कोई लावे सोई अमित जीवन फल पावे ।।

चारों जुग परताप तुम्हारा, है परसिद्ध जगत उजियारा ।
साधु संत के तुम रखवारे। असुर निकंदन राम दुलारे ।।

अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन्ह जानकी माता ।
राम रसायन तुम्हरे पासा सदा रहो रघुपति के दासा ।।

तुम्हरे भजन राम को पावें जनम-जनम के दुख बिसरावें ।
अन्त काल रघुबर पुर जाई, जहां जन्म हरि भक्त कहाई ।।

और देवता चित्त न धरई हनुमत सेई सर्व सुख करई ।
संकट कटे, मिटे सब पीरा, जपत निरंतरहनुमत बलबीरा ।।

जय जय जय हनुमान गोसाईं कृपा करो गुरुदेव की नाईं ।
जो सत बार पाठ कर कोई छूटई बन्दि महासुख होई ।।

जो पढ़े हनुमान चालीसा होय सिद्धि साखी गौरीसा ।
तुलसीदास सदा हरि चेरा, कीजै नाथ हृदय मंह डेरा ।।

।।दोहा।।

पवन तनय संकट हरन मंगल मूरति रूप ।
राम लखन सीता सहित हृदय बसहु सुर भूप ।।



आरती

मनोजवं मारुत तुल्यवेगं ,जितेन्द्रियं,बुद्धिमतां वरिष्ठम् ।।
वातात्मजं वानरयुथ मुख्यं, श्रीरामदुतं शरणम प्रपद्धे ।।

आरती कीजै हनुमान लला की । दुष्ट दलन रघुनाथ कला की ॥
जाके बल से गिरवर कांपे । रोग दोष जाके निकट ना झांके ॥
अंजनी पुत्र महा बलदाई । संतन के प्रभु सदा सहाई ॥
दे वीरा रघुनाथ पठाये । लंका जाये सिया सुधी लाये ॥

लंका सी कोट संमदर सी खाई । जात पवनसुत बार न लाई ॥
लंका जारि असुर संहारे । सियाराम जी के काज संवारे ॥
लक्ष्मण मुर्छित पड़े सकारे । आनि संजिवन प्राण उबारे ॥
पैठि पताल तोरि जम कारे । अहिरावन की भुजा उखारे ॥

बायें भुजा असुर दल मारे । दाहीने भुजा सब संत जन उबारे ॥
सुर नर मुनि जन आरती उतारे । जै जै जै हनुमान उचारे ॥
कंचल थाल कपूर लौ छाई । आरती करत अंजनी माई ॥
जो हनुमान जी की आरती गाये । बसहिं बैकुंठ परम पद पायै ॥
लंका विध्वंस किये रघुराई । तुलसीदास स्वामी कीर्ति गाई ॥
आरती किजे हनुमान लला की । दुष्ट दलन रघुनाथ कला की ॥

प्रकाशित : १० माघ २०७६, शुक्रबार

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